जिंदगी गांवों की : एक नजारा

रवि प्रकाश जूनवाल 

 हैलो सरकार ब्यूरो प्रमुख

 जयपुर। संसार का प्रत्येक मनुष्य ऐशोआराम की जिंदगी जीना चाहता है लेकिन गांवों के विशेषकर किसान लोगों की जिंदगी बड़ी अजब गजब की होती है।

किसान ऐसे किस्म के व्यक्ति होते हैं, जिन्हें न कोई लोभ होता है, न कोई लालच होता है और ना ही किसी प्रकार की प्रतिद्वंदिता होती है। जहां चाहा वहां रहा।

सर्दी हो या गर्मी हो या फिर बारिश हो सभी मौसम में किसान की जिंदगी हमेशा खुले में ही रहती है अर्थात् उसे सर्दी में भी अपने खेत पर काम करता हुआ मिलेगा और गर्मी में भी खेत पर काम करता हुआ मिलेगा और बारिश में भी भीगता हुआ अपने खेत पर काम करता हुआ मिलेगा।

लेकिन किसान को, जिसे अन्नदाता के रूप में सारी दुनिया जानती भी है और मानती भी है। उसी अन्नदाता के लिए सरकारी योजना का लाभ ऊंट के मुंह में जीरे के समान होता है। यह किसान के साथ सबसे बड़ा मजाक है। जहां किसान की मौत खेत में काम करने के दौरान हो जाती है तो गवर्नमेंट की योजना के अनुसार उसे एक लाख रुपए का प्रावधान कर रखा है। मृतक किसान के परिजनों को जो सरकार द्वारा मुआवजा राशि दी जाती है, वह भी बड़ी मशक्कत करने के बाद मिलती है। जो बड़ी शर्म की बात है। जबकि शहरों में कोई आदमी कार्य के दौरान मर जाता है तो एक तरफ विभिन्न संगठनों द्वारा आवाज उठाई जाती है तो दूसरी तरफ राजनीतिक लोग अपने अपनी रोटियां सेकने के लिए बहुत बड़ा मुद्दा बनाते हुए किसान से सैकड़ों गुना मुआवजा लेकर मृतक के परिजनों को सरकारी नौकरी की मांग तक कर डालते हैं। बड़ी विचित्र बात है।

सरकार की ऐसी दोगली नीति पर इस बात का सहज आभास हो जाता है कि शहरी क्षेत्रों में छोटी सी आवाज उठाने पर बड़ा मुद्दा बन जाता है, जबकि गांवों के किसानों के साथ किसी प्रकार का हादसा या घटना होने पर उसको नजरअंदाज कर दिया जाता है। इसे लोक कल्याणकारी सरकार नहीं कहा जा सकता। ऐसी सरकार की दोगली नीति को दबाव की राजनीति कहा जा सकता है।

इसलिए सरकार दोगली नीति को छोड़कर लोक कल्याण के लिए समान मुआवजा, समान परिलाभ की लोक कल्याणकारी नीतियों को अपनाना चाहिए, तभी सही मायनों में लोक कल्याणकारी भावना सार्थक हो सकती है।

 

 

 

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