राष्ट्रपति शासन लागू होने की संभावना बन रही है राजस्थान में : जिम्मेदार कौन ??

कजोड़ मल मीना
B.A., B.J.M.C., LL.B.
एडवोकेट


भारतीय लोकतंत्र में “त्यागपत्र पॉलिटिकल ड्रामा” के नाम से एक नया शफूगा सामने आया है। हालांकि भारतीय लोकतंत्र में ऐसी परिस्थितियां नई नहीं है। पहले भी अलग-अलग रूपों में ऐसी घटनाएं घट चुकी है। कुल मिलाकर राजनेताओं के स्वार्थपरकता के चलते आम जनता के लिए ठीक नहीं है।
मीडिया से आ रही खबरों के मुताबिक राजस्थान की राजनीति में “त्यागपत्र पॉलिटिक्स ड्रामा” की स्क्रिप्ट घटना से कई दिन पहले लिखी जा चुकी थी।
ताजा घटनाक्रम के मुताबिक राजस्थान की राजनीति में एक तरफ प्रदेश कांग्रेस सत्ता में होते हुए भी हाईकमान के हाई वोल्टेज की चपेट में आ रही है, तो दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनिया संभवतः दिल्ली हाईकमान के पास जाकर राजस्थान की राजनीति के ताजा घटनाक्रम की रिपोर्ट दे रहे हैं।

इस आलेख के लेखक ने भारतीय दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, राजस्थान भू राजस्व अधिनियम, राजस्थान भू राजस्व धारा 90A (ग्रामीण) नियम, 2007 व राजस्थान भू राजस्व धारा 90A (शहरी) नियम 2012 के लेखक हैं। लेखक की उक्त सभी रचनाएं गूगल प्ले स्टोर पर निःशुल्क उपलब्ध है।


रिपोर्टों के मुताबिक मुख्यमंत्री पद की लालसा में अशोक गहलोत अपने गुट के सारे विधायकों को “त्यागपत्र पॉलिटिकल ड्रामा” का गेम खेलकर हाईकमान की धधकती आग में झोंक रहे हैं। जबकि दूसरी ओर सचिन पायलट गुट हाईकमान के भेजे गए ऑब्जर्वर्स के सामने सभी विधायक उपस्थित नहीं होने के कारण अनुशासनहीनता का फायदा उठाने की जुगत में लग रहे हैं। ठीक इसी प्रकार तीसरी ओर डॉ सतीश पूनिया द्वारा भाजपा आलाकमान को राजस्थान के ताजा राजनीतिक घटनाक्रम के बारे में अवगत कराने पर केंद्र सरकार को यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि राज्यपाल से 92 विधायकों द्वारा विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर दिए दिए त्यागपत्रों के बारे में वस्तुस्थिति रिपोर्ट लेकर उचित कार्रवाई करें।
राजस्थान विधानसभा कार्रवाई संचालन नियमों के नियम 173 के उपनियम (2) तथा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 190 के खण्ड (2) के भाग (ख) के तहत व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर सदन के सदस्य द्वारा त्यागपत्र दिए जाने पर सभापति या विधानसभा अध्यक्ष को तुरंत त्यागपत्र स्वीकार करना ही पड़ता है। राजस्थान में ऐसी परिस्थितियां पैदा होने पर विधानसभा के प्रतिपक्ष उपनेता राजेंद्र राठौड़ राजस्थान में राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग उठा रहे हैं। यदि संविधान और नियमों के तहत बात की जाए तो राजेंद्र राठौड़ की मांग उचित लगती है।
आखिरकार, यदि राजस्थान में ताजा घटनाक्रम के आधार पर राष्ट्रपति शासन लागू होता है तो उसका जिम्मेदार किसे ठहराया जाए, अशोक गहलोत गुट या सचिन पायलट गुट को या फिर कांग्रेस हाईकमान को या फिर भाजपा को। ऐसी परिस्थिति से निबटने के लिए राजस्थान की जनता ऐसे राजनेताओं के खिलाफ मुखर होकर दमखम के साथ जवाब मांगना जरूरी है।
अब देखना होगा कि क्या केंद्र सरकार विधायकों के त्यागपत्र के बारे में राजस्थान के राज्यपाल से ताजा राजनीतिक घटनाक्रम के बारे में रिपोर्ट मांगकर राष्ट्रपति शासन लागू करने की स्थिति पैदा होती है या नहीं, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। बहरहाल, मुख्यमंत्री पद की भूख ने राजस्थान की जनता को चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। इससे न केवल राजस्थान की विकास की गति धीमी पड़ेगी, अपितु राज्य की नौकरशाही भी बेलगाम होती नजर आ रही है। जो कि राजस्थान प्रदेश के लिए घातक साबित हो सकती है।

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